BASIC THEORY OF INDIAN MUSIC (NOTES 2)

BASIC THEORY OF INDIAN MUSIC (Notes 2)

संगीत में अलंकार किसे कहते है? 

   
उत्तर: नियमानुसार स्वरों की चलन को अलंकार कहते है। प्रत्येक अलंकार में मध्य 'सा' से लेकर तार 'सा' तक आरोही वर्ण और तार 'सा' से मध्य 'सा' तक अवरोही वर्ण हुआ करता है। अलंकर का अवरोह आरोह का ठीक उल्टा होता है। अलंकार को 'पलता' भी कहते है।

उदाहरण:

. आरोहसा रे नि सां
    
अवरोह: सां नि रे सा।।

. आरोहसाग, रेम, गप, मध, पनि, धसां
   
अवरोह: सांध, निप, धम, पग, मरे, गसा।।


आरोह और अवरोह क्या है?

स्वरों के बढ़ते हुए क्रम को आरोह और इसके विपरीत स्वरों के उतरते हुए क्रम को अवरोह कहते है।

संगीत में स्वर क्या है?

       संगीत में 22 श्रुतियोँ में से मुख्य 12 श्रुतियोँ को स्वर माना गया है जिसमे 7 शुद्ध स्वर और बाकी 5 विकृत स्वरों के श्रेनी में आते है। 

पंडित अहुवल जी का कहना है कि "जो सुनने वालों के चित्त को प्रसन्न करें, वह ध्वनि ही स्वर है।"

संगीत में सात शुद्व स्वरों के नाम है

षड्ज(सा) ऋषभ(रे)गन्धार(मध्यम()पंचम(धैवत() और निषाद(नि )


5 विकृत स्वर के भी दो प्रकार है- जिसमें 4 कोमल विकृत और 1 तीव्र विकृत स्वर है।

1. कोमल विकृत  स्वर - रे, , , नि

2.  तीव्र विकृत  स्वर - (ऊपर खड़ी रेखा)

(सा) और (प) हमेशा शुद्व रहते है।




संगीत पद्धतियां(Two main branches of Indian Classical Music)

हमारे शस्त्रीय संगीत के दो प्रमुख संगीत पद्वतियां-

. उत्तरी संगीत पद्धति (Hindustani Classical Music Style)
   (Popular in Bengal, Orissa, Bihar, Jharkhand, UP, Haryana, Punjab, Jammu-kashmir and Maharashtra)

. दक्षिणी संगीत पद्धति (Carnatic Classical Music Style)
  (Popular in Tamil Nadu, Kerala, Andhra Pradesh, Mysore, and all over south regions)

INDIAN MUSIC NOTATION SYSTEM (भारतीय शास्त्रीय संगीत स्वरलिपियाँ)        

संगीत में स्वरलिपि किसे कहते है?

स्वरलिपि भारतीय शास्त्रीय संगीत को लिखित रूप में निरूपित करने के लिए प्रयुक्त प्रणाली है।

शास्त्रीय संगीत के दो प्रमूख स्वरलिपि पद्धति:

आधुनिक काल की दो महान संगीत हस्तियों पं विष्णु दिगम्बर पलुस्कर तथा पं विष्णु नारायण भातखण्डे का योगदान अद्वितीय रहा है। इन दोनों विद्वानों ने संगीत के क्रिया पक्ष को लेखबद्ध करने का गुरूतर कार्य प्रारंभ किया। फलस्वरूप, भारत में प्रथम बार इतने बृहद् स्तर पर राग की बंदिशों का लेखन प्रारंभ हुआ। पं भातखण्डे जी द्वारा प्रचार पायी हुई स्वरलिपि पद्धति को ज्यादातर लोगों ने अपनाया।
   
अधुना, अधिकांश पुस्तकों का निर्माण पं भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति द्वारा ही किया जा रहा है।





Courtesy: राग परिचय-भाग -1 हरिशचंद्र श्रीवास्तव



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